
हमें भी बताओ...कैसे तुम
दिल पे पत्थर रखते हो ?
कैसे तुम!अकेले-अकेले ही
दर्द ये सारा सहते हो ?
आंसू तो भर आते होंगे
तुम्हारे भी आँखों में,
बिना किसी से कहे कुछ
कैसे इन्हें तुम पी जाते हो ?
उफ़ान तो बहुत मचाते होंगे
अरमान तुम्हारे भी सीने में....
कैसे तुम! इन तूफानों में
खुद को यूँ संभाले रहते हो?
इन अनचाही हवाओ में कभी
तुम्हारा भी दम घुटता होगा....
कैसे तुम! अपनी साँसों को
रोक-कर भी ज़िन्दा रहते हो ?
हमें भी सिखाओ! आखिर तुम
इतनी हिम्मत कहाँ से लाते हो...
सब कुछ लुट जाने पर भी
कुछ उम्मीद जगा कर रखते हो!!!
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