गंदी नाली के कीड़े है ये वहशी लोग
जो रात –दिन पनप रहे है किसी
गटर के गंदे पानी में.
छि: घिन्नता से भर रहा है
मन
खिज रहा है इसकी दुर्गन्ध
से
साँस भी लेना दुश्वार हुआ
है
इस अमानवीय माहौल में .
इंसान नहीं ये भेङिये है
निकल पड़ते है शिकार पे और
नोचते है अपनी ही संस्कृति
को
तृप्त करने वासना की प्यास
को .
आओं रोंद दे इन्हें अभी की
अभी
अपनी पांव की इन जूतियों से
जो आहार समझकर खा रहे है
निरंतर नारी के वजूद को.
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