Thursday, 6 September 2012

माँ

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आना चाहती हूँ माँ मैं तेरे पास, पर
 
तू ही मुझे कभी बुलाती नहीं
 
इतनी-कितनी दूर है तू मुझसे कि
 
तुझतक मेरी पुकार जाती नहीं
 
कितना तड़पता है दिल मेरा तेरे लिए, पर
 
तू ही दर्द मेरा समझ पाती  नहीं
 
चलती हूँ  धूप में तो जलते है पांव मेरे पर
 
छांव तेरे आंचल कि मुझपे कभी आती नहीं
 
रोते-रोते सो जाती हूँ माँ मैं, पर तू
 
कभी सपनो में भी आके मनाती नहीं
 
फिर भी मुझ को यकीन है कि बुलाएगी इक दिन
 
दिल कि दुआ कभी खाली जाती नहीं
 
    माँ है वो आखिर क्यों ना सुनेगी
 
 उसके सीने में दिल है कोई पत्थर नहीं है .... 
 

    

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